DESTINAT की कहानियाँ
फ़िरा के पास की जगह

फ़िरा ने कुर्सी पर हरा फ़ीता बाँधा।
वह नूबो की कुर्सी और ओरुमी की जगह के बीच, ठीक खिड़की के पास था। मेहमान आते ही वहाँ बैठना था। अपने नए गर्म फलों के शरबत पर नूबो का जवाब और आलू जैसे बादल की ओरुमी की पूरी कहानी सुनने की उत्सुकता थी।
अभी उसने मेज़पोश सीधा किया।
फिर पड़ोसन मशरूम का कटोरा लेकर आई। पीछे पुराने पेड़ के दो निवासी पहुँचे। कोई रोटी लाया, कोई पाले से ढका रोवन फल और किसी के कोट पर इतनी बर्फ़ थी कि दरवाज़े में छोटा ढेर पिघलने लगा।
फ़िरा ने सबको गले लगाकर मेज़ तक पहुँचाया। हर मेहमान को जानती थी और याद था किसे चूल्हे के पास बैठना पसंद है।
नूबो ने मेज़ का अतिरिक्त हिस्सा निकाला। ओरुमी ने कुर्सियाँ सोचीं, फिर खुद बनाने की खुशी में उन पर बो बाँधे। एक बो वास्कट के किनारे अटक गया।
फ़िरा ने अपनी जगह के पास फलों का शरबत रखा।
“बस अभी बैठने आ रही हूँ।”
“फ़िरा, रोटी कहाँ रखूँ?”
उसने परोसने की थाली बताई। लौटी तो किसी को सूखा कपड़ा चाहिए था। फिर पता चला दो कटोरे भंडार में थे। उन्हें लाई तो किसी ने स्नानघर का रास्ता पूछा।
मेज़ पर बात बादल तक पहुँची।
फ़िरा को बस इतना सुनाई दिया:
“…और फिर पता चला वह आलू था ही नहीं।”
सब हँस पड़े।
उसकी कुर्सी अभी भी खाली थी। वह कटोरे गोद में लेकर दरवाज़े की सीढ़ी पर बैठ गई। उन्हें रखना चाहती थी, लेकिन कुछ पल उठने का मन नहीं था।
नूबो और शरबत लेने रसोई गया। अधखुले दरवाज़े से उसे देखा।
“यहाँ दूसरी मेज़ है?”
“नहीं।”
वह पास सीढ़ी पर बैठ गया। कटोरों की हल्की खनक हुई।
“खाना पसंद नहीं आया?” उसने पूछा।
“अभी चखा नहीं।”
नूबो ने सिर झुकाया।
फ़िरा ने पंखुड़ी का किनारा सीधा किया।
“मुझे सबका यहाँ होना अच्छा लगता है। बस तुम्हारे साथ मेज़ पर भी बैठना चाहती हूँ।”
ओरुमी ने खाने के कमरे से झाँका।
“कहानी फिर शुरू कर रहा हूँ। आलू तो बस शुरुआत था।”
गोद में कटोरे देखकर पास आया।
“ये भरे हैं?”
“नहीं।”
“तो मैं अंदर ले जाता हूँ।”
फ़िरा ने कटोरे ओरुमी को देकर उठी।
“चलो। अब बैठ रही हूँ। रोटी कौन बाँटेगा?”
“मैं,” नूबो ने कहा।
खाने के कमरे में मेज़ के पास रुककर सारी सजावट देखी।
“हमें थोड़ा अलग इंतज़ाम करना होगा।”
परोसने की थालियाँ बीच में रखीं और चूल्हे के पास छोटा तख्ता लगाया ताकि सब अपने बर्तन रख सकें। मशरूम वाली पड़ोसन तुरंत करछुल ले आई। पुराने पेड़ के निवासी शरबत डालने लगे।
ओरुमी ने जाँचा कि सबके लिए कुर्सी है। फिर हरे फ़ीते वाली कुर्सी निकाली।
फ़िरा अपनी कुर्सी के पास रुकी।
“सिर्फ़ मेरे लिए खास जगह बनाने की ज़रूरत नहीं।”
“तुमने बना ली है,” ओरुमी ने जवाब दिया।
वह बैठ गई। नूबो ने थाली पास की और पड़ोसन ने रोटी दी। कुछ देर फ़िरा चुपचाप खाती रही।
“अच्छा है?” नूबो ने पूछा।
“बहुत।”
ओरुमी ने कोहनियाँ मेज़ पर रखीं।
“तो मैं बादल पर तैर रहा था। दूर से वह आलू लग रहा था…”
पहले सुने हिस्से तक पहुँचने से पहले ही फ़िरा हँस पड़ी।
बाद में किसी ने चीनी पूछी तो पड़ोसन पहले उठी।
फ़िरा की पंखुड़ियाँ अपने आप हिलीं।
नूबो ने उसकी कुर्सी पर हाथ रखा।
“बैठी रहो। अभी पता नहीं चला वह बादल सच में क्या था।”
फ़िरा आराम से कुर्सी पर बैठ गई। मेज़ के नीचे हरा फ़ीता पैरों से छू रहा था और दोनों ओर दोस्त थे, जिन्हें उस शाम कहीं और नहीं जाना था।