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कहानी 04 · destiNAT

ज़ोफ़िया जी की आवाज़

26 जनवरी 1919 का वारसॉ और आज के समय का 11 नवंबर

पोलैंड के इतिहास में नूबो, फ़िरा और ओरुमी की कल्पनात्मक यात्रा का चित्र

"पोलैंड ने अपनी स्वतंत्रता फिर पा ली, तो उसके बाद क्या हुआ?" ओरूमी ने पूछा।

नीली धारा ने रोशनी की एक लकीर से जवाब दिया। इस बार रास्ते के पार बर्फ़ थी। नूबो लगभग तुरंत बर्फ़ के ढेर में धँस गया और फ़ीरा ने उसे हाथ दिया।

26 जनवरी 1919 था। दोस्त एक बार फिर वारसॉ में थे।

एक इमारत के सामने कतार लगी थी। एक महिला एक लड़की का स्कार्फ़ ठीक कर रही थीं। लड़की ठंड से अपनी नाक छिपाने की कोशिश कर रही थी।

"माँ, क्या आज सच में तुम्हारी आवाज़ गिनी जाएगी?" लड़की ने पूछा।

ओरूमी उत्सुक होकर रुक गया।

"मुझे तो तुम्हारी माँ की आवाज़ सुनाई दे रही है। अभी तो वे बोल रही थीं।"

लड़की हँस पड़ी।

"यह दूसरी तरह की आवाज़ है! मैं ज़ोस्या हूँ। और ये मेरी माँ हैं, ज़ोफ़िया जी।"

महिला ने समझाया कि फिर उभरे पोलैंड की सेय्म, यानी संसद, के लिए चुनाव हो रहे हैं। वयस्क नागरिक अपने प्रतिनिधि चुनते हैं, जो देश के कानूनों पर काम करेंगे।

"पिछले साल 28 नवंबर से महिलाओं को वोट देने और उम्मीदवार बनने का अधिकार है," उन्होंने जोड़ा। "बहुत-सी महिलाएँ लंबे समय से प्रयास कर रही थीं कि वे भी देश के मामलों के निर्णयों में भाग ले सकें। अब मैं भी अपना वोट दे सकती हूँ।"

ज़ोस्या ने उनका हाथ कसकर पकड़ लिया।

"मैं अभी नहीं दे सकती। माँ कहती हैं कि मैं बहुत छोटी हूँ।"

"लेकिन तुम सवाल पूछ सकती हो," फ़ीरा ने जवाब दिया। "तुम्हारी वजह से ही हमने भी कुछ सीखा है।"

कतार आगे बढ़ी। ओरूमी ने दीवार के पास एक काग़ज़ देखा और उसे उठाने झुक गया।

"एक गुम हुआ वोट!" उसने घबराकर कहा।

ज़ोफ़िया जी ने मिले हुए काग़ज़ को देखा।

"यह कोयले का बिल है।"

ओरूमी ने काग़ज़ को दोनों तरफ़ से देखा और पास खड़े एक आदमी के पास ले गया। अच्छी बात थी कि उसके मालिक को उसी की तलाश थी।

जब ज़ोफ़िया जी की बारी आई, तो दोस्त ज़ोस्या के साथ प्रवेश-द्वार पर रुक गए। नूबो अंदर जाते लोगों को देख रहा था। यहाँ न कोई मंच था और न बड़ा वाद्यवृंद। जूते चरमरा रहे थे, कोई अपने कोट से बर्फ़ झाड़ रहा था और कोई किसी बुज़ुर्ग को आगे जाने दे रहा था।

"क्या यह भी स्वतंत्रता का हिस्सा है?" उसने धीरे से पूछा।

"शायद हम देख रहे हैं कि लोग मिलकर अपना देश सँवारना कैसे शुरू करते हैं," फ़ीरा ने जवाब दिया।

ज़ोस्या ने बताया कि वह चाहती है कि उसके स्कूल में और किताबें हों। नूबो ने उसकी पसंदीदा कहानी पूछी। लड़की इतनी बातें करने लगी कि उसे माँ का लौटना लगभग पता ही नहीं चला।

ज़ोफ़िया जी अंदर जाने से पहले जैसी थीं, अब भी वैसी ही लग रही थीं। उनका वही कोट था और वही ज़रा-सी टेढ़ी टोपी। फिर भी ज़ोस्या उनसे ऐसे लिपटी, जैसे वे अभी किसी बहुत महत्वपूर्ण यात्रा से लौटी हों।

नीली धारा दोस्तों को वापस ले आई। जब वे परिचित सड़क पर निकले, तो फिर नवंबर था, लेकिन अब उनके अपने समय में। इमारतों पर झंडे लगे थे। पास के स्कूल से पर्व के समारोह के अभ्यास की आवाज़ आ रही थी।

पुस्तकालय के प्रवेश-द्वार पर एक बच्चा बिखरी किताबें उठा रहा था। ओरूमी ने अनायास उस चौक की ओर देखा, जहाँ समारोह शुरू होने वाला था, फिर किताबों के पास बैठ गया।

नूबो ने किताबें ट्रॉली पर जमाने में मदद की। फ़ीरा ने दरवाज़ा पकड़कर रखा। वे सबके मिलकर राष्ट्रगान गाने से पहले चौक पहुँच गए। दूसरे लोगों के साथ शांत होकर खड़े हो गए।

बाद में उन्होंने पुरानी तस्वीरों की प्रदर्शनी देखी। एक तस्वीर में टोपी पहने एक महिला मोटा स्कार्फ़ लपेटे एक लड़की के पास खड़ी थी। वे नहीं जान सकते थे कि वे ज़ोफ़िया और ज़ोस्या ही हैं या नहीं। फिर भी उन्हें देखकर फ़ीरा मुस्कुरा दी।

"अब मुझे पता है कि उसके बाद क्या हुआ," ओरूमी ने कहा। "बहुत सारे साधारण दिन, जिनमें लोगों को महत्वपूर्ण काम करने थे।"

नूबो ने कॉपी का एक नया पन्ना खोला। इस बार उसने 11 नवंबर की तारीख के नीचे पुस्तकालय का पता भी लिख दिया। उन्होंने आखिर वादा किया था कि वे लौटकर किताबों की अगली ट्रॉली में भी मदद करेंगे।

पात्र और उनके संवाद काल्पनिक हैं। वयस्कों के लिए टिप्पणी में ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समझाई गई है। वयस्क पाठक के लिए